Monday, 21 December 2015

गुमनाम मुसाफिर की कामाख्या शक्तिपीठ की यात्रा

करीब १० दिसम्बर के समय अमिताभ ने मुझसे गुवाहाटी चलने के बारे में पूछा l असल में उसे गुवाहाटी में रेलवे के जूनियर इंजिनियर का साक्षात्कार देने जाना था l और उसका साक्षात्कार १९  दिसम्बर  को होना था l अब इतनी जल्दी किसी यात्रा पर चलने के लिये तैयार हो पाना बड़ी दुविधा की स्थिति होती है इसे कोई भी समझ सकता है और वह भी जाड़े के मौसम में l मैं प्रायः जाड़े के मौसम में यात्रा करना पसंद नहीं करता l हाँ वहाँ पर कामाख्या शक्तिपीठ है जो देवी के ५१ शक्तिपीठों में सर्वोच्च माना है l ये सभी शक्तिपीठ वहीँ है जहाँ देवी सती के अंग गिरे थे l 
खैर एक दिन सोच-विचारके बाद मैं वहाँ जानेको तैयार हो गया l १६ तारीख का टिकट भी मिल गया इस तरफसे नार्थईस्ट ट्रेन में l ये ट्रेन रात को करीब १० बजे आनेवाली थी l लेकिन ये ट्रेन आजकल रोज देर से चल रही थी l और प्रायः सुबह ही आया करती थी l किसी दिन २ बजे तो किसी दिन ५ बजे l ऐसे में इस ट्रेन को घर से खुलने के समय पकड़ पाना एक समस्या थी l इसके लिये हमने फैसला किया की घर से ९-१० बजे तक स्टेशन पहुँचकर वहीँ पर डोरमेट्री लेकर ट्रेन की प्रतीक्षा की जाय l क्योंकि अगर ट्रेन ३-४ बजे सुबह आती तो उसे घरसे आकर पकड़ पाना संभव नहीं था l  मैं करीब पौने नौ बजे पटना स्टेशन पहुँच गया l अमिताभ मुझसे पूर्व ही वहाँ पहुँचा हुआ था गया से l स्टेशन के वेटिंग रूम में काफी भीड़ थी l हमारे लिये वहाँ जगह नहीं बची थी l और १ नम्बर प्लेटफार्म पर भी काफी भीड़ थी l  हम सीढियों के तरफ एक खाली जगह पर चद्दर बिछाकर बैठ गये l करीब ११ बजे मैंने अमिताभ को डोरमेट्री के बारे में पता करने भेजा तो उसने आकर बतलाया की वहाँ डोरमेट्री लेने के लिये काफी लोग लाइन में खड़े थे तथा वहाँ कोई जगह खाली नहीं थी l अब हमारे पास अगला विकल्प था होटल में कमरा लेने का l लेकिन स्टेशन के पास के होटल में कमरा महँगा ही मिलता और ४-५ घंटे के लिये हम उतना खर्च करने को तैयार नहीं थे l फिर हमने स्टेशन पर ही रात गुजारने का फैसला किया l वैसे भी हमारे पास ठंढ से बचने के लिये कम्बल आदि थी अतः हमारे लिये फ़िक्र की कोई बात नहीं थी l तब हमने प्लेटफार्म पर ही थोड़ा दूर हटकर जहाँ रेलवे से माल की ढुलाई होती है उसके गोडाउन के पास अपना अड्डा जमाया l वहाँ कोई भीड़ नहीं थी तथा जगह बिल्कुल खाली थी l हम आराम से वहीँ पसर गये l नींद क्या आनी थी l हाँ ट्रेन की प्रतीक्षा करने के लिये ये जगह उपयुक्त थी l रात में करीब ३ बजे के आसपास चाय पी l फिर सुबह करीब ४ बजे स्टेशन पर ही फ्रेश हो गये l ट्रेन करीब ५ बजे आनी थी l ट्रेन आने पर उसमें काफी भीड़ थी और हमारे सीट पर भी कोई सोया हुआ था l मजबूरन हमें उन्हें हटाना पडा लेकिन हम क्या कर सकते थे l हटाये गये लोग बोल रहे थे की वे अभी तुरंत ही बैठे थे l फिर हम अपने सीट पर लेट गये l ट्रेन रुकते-रुकते काफी लेट हो चुकी थी l शाम को करीब ५ बजे उसने हमें कटिहार तक ही पहुँचाया था l जबकि ये उसके गुवाहाटी पहुँचने का समय था l हमारे आस-पास ३-४ फौजी भाई लोग थे जो छुट्टी बिताकर वापस नार्थईस्ट के राज्यों में अपने ड्यूटी पर जा रहे थे l वे लोग आपस में हँसी मजाक करते हुए चल रहे थे l उनके साथ सफ़र अच्छा ही बीता l मैंने ट्रेन की यात्राओं में एक बात महसूस की है कि फौजी लोग पुलिस के मुकाबले दूसरे लोगों से जल्दी घुल-मिल जाते है l एक लड़का मणिपुर का मिला और दिल्ली से निशानेबाजी में भाग लेकर वापस आ रहा था l जैसा की उसने बतलाया था की उसने प्रथम स्थान प्राप्त किया था l 
हम दिन में २-३ घंटे सो चुके थे अतः रात में भी विशेष नींद नहीं आनी थी l ट्रेन शाम तक कटिहार पहुँचने तक ही करीब ११ घंटे लेट हो चुकी थी l मैंने राहुल सांकृत्यायन की 'विस्मृत यात्री' पुस्तक ले रखी थी हालाँकि पुरी यात्री में इस पुस्तक के १०-२० पन्नो से अधिक नहीं पढ़ पाया l ये पुस्तक पाँचवी शताब्दी के एक बौद्ध परिवार में जन्मे व्यक्ति के बारे में है  जो बाद में भिक्षु भी बना था l इसमें उनके उस समय की कई देशों में की गयी यात्रा का वर्णन है l उनका जन्म उद्यान (पाकिस्तान में स्थित आजकी स्वात घाटी) में हुआ था l 
ट्रेन ने १८ दिसंबर सुबह ३ बजे हमें गुवाहाटी स्टेशन पहुँचाया l उन फौजियों में ३ कुछ स्टेशन पूर्व शायद रंगेजी स्टेशन पर उतरे तथा एक गुवाहाटी l हम स्टेशन के वेटिंग रूम में आ गये l पटना स्टेशन के उलट यहाँ उतनी भीड़ नहीं थी हमें आराम से जगह मिल गयी l ट्रेन के लेट आने का हमें फायदा ये हुआ कि हमारे एक दिन के होटल के पैसे बच गये l वर्ना अगर ट्रेन शाम को पहुँचती तो हमें एक दिन और होटल लेना पड़ता l वेटिंग रूम से निकलकर हम ५ बजे स्टेशन से निकले होटल की तलाश में l हमने स्टेशन के पास ही ४०० रुपये में डबल बेड का कमरा मिल गया l फ्रेश होकर पूजा आदि कर भोजन कर हम २-३ घंटे सो गये l पहले हमने तुरंत ही कामाख्या मंदिर जाने का सोचा था l करीब ११ बजे उठे और चल पड़े कामाख्या मंदिर की ओर l हमने उससे पूर्व पास में ही स्थित नेपाली मंदिर के दर्शन किये l वहीँ से हमें कामाख्या मंदिर की बस मिलनी थी l वहाँ से तुरंत कामाख्या की बस मिल गयी जिसने हमें करीब १२ बजे कामाख्या पहुँचा दिया l जहाँ बस ने हमें उतारा वहाँसे कामाख्या की दूरी करीब ५ किलोमीटर है l वहाँ से वैन लोगों को लेकर ऊपर पहाड़ी पर जाती रहती है l करीब १५ मिनट में हम ऊपर पहुँच गये l वहाँ पहुँचकर २-३ दूकान घूमकर हम प्रसाद लेकर मंदिर दर्शन करने पहुँचे l 
अब कामाख्या के माहात्म्य की कुछ बात हो जाय :-
देवीभागवत में कामाख्या देवी के महात्म्य का वर्णन है। इसका दर्शन, भजन, पाठ-पूजा करने से सर्व विघ्नों की शान्ति होती है। पहाड़ी से उतरने पर गुवाहाटी के सामने ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य में उमानन्द नामक छोटे चट्टानी टापू में शिव मन्दिर है। आनन्दमूर्ति को भैरव (कामाख्या रक्षक) कहते हैं। कामाख्या पीठ के सम्बन्ध में कालिकापुराण[7] में निम्नांकित वर्णन पाया जाता है-
शिव ने कहा, प्राणियों की सृष्टि के पश्चात् बहुत समय व्यतीत होने पर मैंने दक्षतनया सती को भार्यारूप में ग्रहण किया, जो स्त्रियों में श्रेष्ठ थी। वह मेरी अत्यन्त प्रेयसी भार्या हुई। अपने पिताद्वारा यज्ञ के अवसर पर मेरा अपमान देखकर उसने प्राण त्याग दिए। मैं मोह से व्याकुल हो उठा और सती के मृत शरीर को कन्धे पर उठाए समस्त चराचर जगत में भ्रमण करता रहा। इधर-उधर घूमते हुए इस श्रेष्ठ पीठ (तीर्थस्थल) को प्राप्त हुआ। पर्याय से जिन-जिन स्थानों पर सती के अंगों का पतन हुआ, योगनिद्रा (मेरी शक्ति=सती) के प्रभाव से वे पुण्यतम स्थल बन गए। इस कुब्जिकापीठ (कामाख्या) में सती के योनिमण्डल का पतन हुआ। यहाँ महामाया देवी विलीन हुई। मुझ पर्वत रूपी शिव में देवी के विलीन होने से इस पर्वत का नाम नीलवर्ण हुआ। यह महातुंग (ऊँचा) पर्वत पाताल के तल में प्रवेश कर गया।

शक्ति की पूजा

इस तीर्थस्थल के मन्दिर में शक्ति की पूजा योनिरूप में होती है। यहाँ कोई देवीमूर्ति नहीं है। योनि के आकार का शिलाखण्ड है, जिसके ऊपर लाल रंग की गेरू के घोल की धारा गिराई जाती है और वह रक्तवर्ण के वस्त्र से ढका रहता है। इस पीठ के सम्मुख पशुबलि भी होती है।

पौराणिक मान्यताएँ


कामाख्या शक्तिपीठ, गुवाहाटी
यहाँ देवी की योनि का पूजन होता है। इस नील प्रस्तरमय योनि में माता कामाख्या साक्षात् वास करती हैं। जो मनुष्य इस शिला का पूजन, दर्शन स्पर्श करते हैं, वे दैवी कृपा तथा मोक्ष के साथ भगवती का सान्निध्य प्राप्त करते हैं।
संस्पृश्यं तां शिलां मर्त्योह्यमरत्वमवाप्तुयात्। अमर्त्यो ब्रह्मसदनं तत्रस्थो मोक्षमाप्नुयात्॥[8]
जब योनि का निपात हुआ, तब यह पर्वत डगमगाने लगा। अतः त्रिदेवों ने इसके एक-एक श्रृंग को धारण किया।
अतः यह पर्वत तीन श्रृंगों में विभक्त है। जहाँ भुवनेश्वरी पीठ है, वह ब्रह्मपर्वत, मध्य भाग जहाँ महामाया पीठ है वह शिवपर्वत तथा पश्चिमी भाग विष्णुपर्वत या वाराह पर्वत है। वाराहपर्वत पर वाराही कुण्ड दिखाई देता है। आषाढ़ माह में मृगाशिरा नक्षत्र के चौथे चरण आर्द्रा नक्षत्र के पहले चरण के मध्य देवी का दर्शन तीन दिनों तक बंद रहता है और माना जाता है कि माँ कामाख्या ऋतुमती हैं। चौथे दिन ब्राह्म मुहूर्त में देवी का शृंगार, स्नानोपरांत दर्शन पुनः प्रारंभ होता है। प्राचीन काल में चारों दिशाओं में चार मार्ग थे- व्याघ्र द्वार, हनुमंत द्वार, स्वर्गद्वार, सिंहद्वार। शनैः शनैः उत्तरी तथा पश्चिमी मार्ग लुप्त हो गए। अब चारों ओर पहाड़ी सीढ़ियाँ बनी हैं, जो काफ़ी दुर्गम हैं।[9] कुछ ही भक्त इन सीढ़ियों से जाकर देवी पीठ के दर्शन करते हैं। अधिसंख्य यात्री नीचे से टैक्सियों द्वारा जाते हैं। नीचे मुख्य मार्ग से पहाड़ी मार्ग कामाख्या पीठ बना है, जिसे नरकासुर पथ कहते हैं।
कामाख्या मंदिर के समीप ही उत्तर की ओर देवी की क्रीड़ा पुष्करिणी (तालाब) है, जिसे सौभाग्य कुण्ड कहते हैं। मान्यता है कि इसकी परिक्रमा से पुण्य मिलता है। यात्री इस कुण्ड में स्नान के बाद श्री गणेशजी का दर्शन करने मंदिर में प्रवेश करते हैं। मंदिर के सामने 12 स्तंभों के मध्य-स्थल में देवी की चलंता मूर्ति (चलमूर्ति-उत्सव मूर्ति) दिखती है। इसी का दूसरा नाम हरिगौरी मूर्ति या भोग मूर्ति है। इसके उत्तर में वृषवाहन, पंच-वक्त्र, दशभुज कामेश्वर महादेव हैं। दक्षिण में 12 भुजी सिंहवाहिनी तथा 18 लोचना कमलासना देवी कामेश्वरी विराजती हैं। यात्री पहले कामेश्वरी देवी कामेश्वर शिव का दर्शन करते हैं, तब महामुद्रा का दर्शन करते हैं। देवी का योनिमुद्रा पीठ दस सीढ़ी के नीचे एक अंधकारपूर्ण गुफा में स्थित है, जहाँ हमेशा दीपक का प्रकाशरहता है। उसे कामदेव भी कहते हैं। यहाँ आने-जाने का मार्ग अलग-अलग बना हुआ है।

(स्त्रोत - http://bharatdiscovery.org)

अब अपने कामाख्या मंदिर के दर्शन के विषय में अपने अनुभव बतलाता हूँ l मुझे अपने पिताजी और कुछ अन्य लोगों से ये जानकारी मिली थी कि यहाँ दर्शन करने के लिये पैसे देने पड़ते है l यहाँ जो पैसे देते है उनका दर्शन का नम्बर पहले आता है l और जो बिना पैसों वाले लाइन में लगता है उसका ६-८ घंटों में l जहाँ तक मेरा सवाल है तो मैं अपने को विआइप नहीं समझता l जो समझते हो समझे l मैंने मन में स्पष्ट सोच लिया था कि दर्शन के लिये इस तरह तो पैसों नहीं दूँगा भले ही मुझे बिना दर्शन किये ही लौट जाना पड़े l 
वहाँ पहुँचकर मालुम हुआ की मंदिर के पट दिन में १ बजे बन्द हो जायेंगे और फिर ३ बजे खुलेंगे l अभी १ बजने में १५ मिनट की देर थी l और हाँ उस दिन वे काउन्टर बन्द थे जहाँ दर्शन के लिये पर्ची कटती थी l उसका कारण लाइन में लगने के बाद मुझे एक व्यक्ति ने बतलाया की ट्रस्ट में पैसों को लेकर कुछ विवाद की वजह से ये अस्थाई रूप से बन्द है l खैर विवाद से मुझे क्या लेना देना था हाँ ये मेरे मन लायक बात था क्योंकि मेरे नजर में माता के दरबार में कोई विशेष व्यक्ति नहीं है और पहले आने वाले को पहले दर्शन करने का अधिकार होना चाहिये l लाइन लगकर मैंने सोच लिया था की अब ३ बजे के बाद ही संभवतः बारी आयेगी l लेकिन उस दिन संभवतः भीड़ कम थी और हमने आधे घंटे के अन्दर ही आराम से दर्शन कर लिये l पूजा कराने के लिये २-३ पण्डों ने पूछा था लेकिन किसी ने विशेष जोर नहीं दिया l यहाँ पर मेरा अनुभव यही रहा की ज्यादातर पण्डे पुरोहित सही ही होते है ऐसा ही अनुभव मेरा यमुनोत्री गंगोत्री में भी रहा था l उनकी जीविका ही यही है अतः अगर वे तीर्थयात्रियों से माँगते है तो कुछ भी गलत नहीं है l  मैकाले के मानस पुत्र जोकी भारतीय संस्कृति से घृणा करते है उनके लिये जरुर ब्राह्मण गलत ही रहेंगे l मैंने एक जगह स्वेच्छा से १०० रुपये चढ़ाए अन्दर l और एक पंडा जी जो हमारे लाइन के साथ चल रहे थे उन्होंने हम लोगों की पूजा करवायी थी अन्दर में l हालाँकि उन्होंने हमसे कोई पैसा नहीं माँगा था अन्दर l मैं पूजा कर जब बाहर आ गया उसके करीब ५ मिनट बाद वे आये और मैंने उन्हें खुद जाकर स्वेच्छा से १०० रुपये दिये l 
माता के दर्शन के बाद भी हम करीब एक घंटे के ऊपर मन्दिर परिसर में रहे और वहाँ की तस्वीरे ली l वहाँ कैमरा पर किसी प्रकार का रोक मुझे नजर नहीं आया l वहाँ भण्डारा भी चल रहा था जिसमें जाकर हमने प्रसाद पाया l वहाँ से हम करीब ढाई बजे निकले l ऊपर ही हमें बस मिल गयी जिसने हमें गुवाहाटी स्टेशन उतार दिया l वहाँ से हम होटल में आ गये l अब भोजन के मुद्दे पर आता हूँ l अभी तक तो हमारा घर से लाया भोजन ही काम दे रहा था l शाम को हम भोजन करने निकले l हमें तलाश थी शाकाहारी होटल लेकिन जिस दूकान में जाता वहाँ मछली, मुर्गा और मीट भी मिलता हुआ पाता l आखिर काफी खोज करने के बाद हमें शाकाहारी दूकान मिल ही गयी l वहाँ भोजन घर जैसा ही लगा l हम खा पीकर आकर आराम से सो गये l 
अगले दिन अमिताभ को साक्षात्कार के लिये रेलवे के ऑफिस जाना था जोकी स्टेशन के पास ही था l मैं होटल के कमरे में ही रहा कही बाहर नहीं गया वैसे भी मुझे कामाख्या शक्तिपीठ के अलावा कही दर्शन की न तो इच्छा थी न योजना l हमारा लौटने का टिकट २२ दिसंबर को था दोपहर में आकर अमिताभ ने बतलाया की उसे कोई आवश्यक कागजात फिर से यहाँ जमा करना पड़ेगा १५ दिन के भीतर ही l अतः वह चलने को इच्छुक था l मैं भी तैयार हो गया l हमने स्टेशन से जाकर अगले दिन यानी २० दिसंबर का टिकट ले लिया नार्थईस्ट ट्रेन में जोकी वेटिंग था l हमारा २२ का कन्फर्म टिकट था और हमने सिलोंग जाने का सोचा था अगर समय मिलता तो l लेकिन सिलोंग कोई धार्मिक स्थल नहीं है वह जरुर अपने जलप्रपात के लिये प्रसिद्द है अतः मैं वहाँ जाने को विशेष इच्छुक भी नहीं था l 
२० दिसंबर की सुबह हम स्टेशन पहुँचे l ट्रेन सही समय पर ही थी ९.४५ मिनट पर l वहाँ अमिताभ को एक परिचित लड़का मिल गया जोकी उसी ट्रेन से इलाहाबाद जा रहा था l उससे हमारा यात्रा काफी आरामदायक हो गया l उसके साथ तथा अन्य लोगों के साथ एडजस्ट होकर आराम से मैं पटना आ गया l ट्रेन २१ दिसंबर की  सुबह ४.१५ पर हमें पटना स्टेशन पहुँचा दिया l अमिताभ से विदा लेकर मैं स्टेशन से बाहर आ गया और मेरे तरफ का ऑटो मिल गया  और मुझे उसे रिज़र्व कराने की जरुरत भी नहीं पड़ी क्योंकि अन्य यात्री  भी उस तरफ के जाने वाले मिल गये l करीब पौने ५ बजे घर आ गया l 



पटना स्टेशन १६ दिसंबर 

पटना स्टेशन १६ दिसंबर 

पटना स्टेशन १६ दिसंबर 

पटना स्टेशन १६ दिसंबर 

पटना स्टेशन १६ दिसंबर 

ट्रेन का फौजी सहयात्री 


दो फौजी 



फौजी भाई 


नेपाली मंदिर 

पेड़ से उस तरफ ब्रह्मपुत्र नदी है 

यहाँ से कामाख्या मंदिर ५ किलोमीटर है 





मुख्य मंदिर के बाहर 


पंडा जी के साथ 

अमिताभ 









मंदिर परिसर का नक्शा








घंटियों का समूह 







जप में व्यस्त साधक 


इस परिसर में बकरी की बलि दी जाती है 

एक प्राचीन मंदिर उस परिसर में 


गुवाहाटी स्टेशन 

स्टेशन पर रेलगाड़ी का मॉडल 

ये बोर्ड स्टेशन के बाहर लगा था और लोहे की जाली के पास दिन में सेना के कई जवान खड़े थे 


      

Wednesday, 14 October 2015

यात्रा यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की - 2

इस प्रकार यमुनोत्री कि यात्रा करने बाद अब हमें गंगोत्री जाना था l जानकीचट्टी से हम सुबह करीब आठ बजे निकले l हमने बारकोट की बस पकड़ी l जिसने करीब साढ़े दस बजे तक हमें बारकोट पहुँचा दिया l हमें वहाँ से तुरंत ही उत्तरकाशी की बस मिल गयी l हम उसपर सवार होकर चल पड़े उत्तरकाशी की तरफ जोकी बारकोट से करीब ८५-९० किलोमीटर है l बस ने करीब २ बजे हमें उतरकाशी पहुँचा दिया l हम जब उत्तरकाशी पहुँचे तो गंगोत्री वाली बस लगी हुई थी l जोकी आधे घंटे बाद २.३० में खुलती l हम उत्तरकाशी आते-आते थकान महसूस करने लगे थे तथा यमुनोत्री में हमें ठंढ ने बहुत परेशान किया था इसलिए हमने उत्तरकाशी में ही रुकने का फैसला किया l वैसे उत्तरकाशी से गंगोत्री कि दुरी १०० किलोमीटर ही है l वहाँ जाकर हम बिरला धर्मशाला में ठहरे  जोकी बस अड्डे के पास ही है l फिर भोजन आदि करके २-३ घंटे आराम करके हम शाम को वहाँ के विश्वनाथ मंदिर गये l  धार्मिक दृष्टि से उत्तरकाशी का महत्व काशी (वाराणसी) के तरह ही है l यहाँ भी विश्वनाथ मंदिर से थोड़ी दूर पर केदार घाट और मणिकर्णिका घाट है l मार्ग की जानकारी के अभाव में उन घाटों पर हम नहीं जा सके l इसके अलावा उत्तरकाशी में नचिकेता ताल भी है l जिसके बारे में ऐसी मान्यता है की आज भी वहाँ नचिकेता आते है l हमने एक स्थानीय व्यक्ति से पूछा तो उसने बतलाया कि पहले इसके लिए १२ किलोमीटर ऑटो से जाना होगा फिर १८ किलोमीटर पैदल इसलिए हमने वहाँ जाने का विचार छोड़ दिया l नचिकेता और यमराज का प्रसिद्द संवाद कठोपनिषद् में वर्णित है l इस प्रकार ४ अक्टूबर की शाम को हम उत्तरकाशी में थे l हम वहाँ काशी विश्वनाथ मंदिर तथा बगल में स्थित हनुमान मंदिर गये l हम काशी विश्वनाथ मंदिर में शाम को ७ बजे होने वाली आरती में शामिल हुए l इसके अलावा मंदिर परिसर में स्थित विशाल और वजनी त्रिशूल के दर्शन किये जिसके बारे में कहा जाता है की इसी से देवी ने महिषासुर का वध किया था l
वहाँ के कुछ फोटो -
इसी त्रिशूल के बारे में ये माना जाता है कि इससे देवी ने महिषासुर का वध किया था l


 त्रिशूल का निचला भाग

रात को वहाँ से होकर भोजन आदि के बाद हम वापस बिरला धर्मशाला में आ गये l अगले दिन हमें गंगोत्री जाना था l वहाँ जाने के बारे में पता किया तो मालुम पड़ा की आजकल तीर्थयात्री कम आ रहे हैं इसलिए कम ही बस वहाँ जा रही है l हमें वहाँ जीप से जाना होगा l अगली सुबह करीब ६ बजे हम गंगोत्री के लिए निकल पड़े l जीप बीच-बीच में रुकते-रुकते जा रही थी l हम भी प्राकृतिक नज़ारे का आनंद लेते हुए करीब पौने ११ बजे गंगोत्री पहुँच गये l यमुनोत्री कि भाँति गंगोत्री में ज्यादा नहीं चलना पड़ता सिर्फ ५०० मीटर कि दुरी पर मंदिर है जहाँ जीप ने हमें उतारा था l प्रस्तुत है उत्तरकाशी से गंगोत्री तक का सफ़र फोटो के माध्यम से -


रास्ते में रुककर चाय पीते हुए

गंगोत्री जाते समय पत्थर गिरने से मार्ग अवरुद्ध हुआ था l लेकिन क्रेन के द्वारा १० मिनट में ही मार्ग को साफ़ कर लिया गया l

ऐसी भयानक और बड़ी चट्टान कई जगह  मौजूद है जो कभी भी गिर सकती है l



यही पर जीप ने हमें उतारा था l

एक विदेशी यात्री






गंगोत्री मंदिर



ये हमारे साथ जीप में उत्तरकाशी से साथ आये थे l ये महाराष्ट्र के थे l इन्होने बतलाया की वे ३५ वर्ष पूर्व चार धाम की यात्रा कर चुके है l इस बार भी चार धाम कि यात्रा पर निकले थे l सबसे पहले ये गंगोत्री आये थे l वापसी में ये हमारे साथ ही गये थे उत्तरकाशी और बिरला धर्मशाला में ही ठहरे थे l ये वहाँ से यमुनोत्री के लिए निकले थे अगले दिन l

यहाँ हमने आलु के पराँठे खाए थे l

चूँकि यमुनोत्री में हमें ठण्ड बर्दास्त से बहर लगी थी अतः हमने गंगोत्री में नहीं रुकने का फैसला किया था l वहाँ करीब डेढ़ दो घंटे रुकने के बाद हम वापस दूसरी जीप से उत्तरकाशी चल दिए थे l वापसी का सफ़र फोटो के माध्यम से -


 अमिताभ और ड्राईवर
 रास्ते में मौजूद सेब के बगान l सेब ४० रुपये किलो मिल रहा था l जीप में मौजूद लगभग सभी ने खरीदी लेकिन मैंने नहीं क्योंकि मुझे सेब ज्यादा पसंद नहीं l





 गंगोत्री से वापस आकर इतना थक गया था की हमें करीब २ घंटे तक उठने की हिम्मत नहीं हुई l

इस प्रकार गंगोत्री धाम के दर्शन कर हम ५ अक्टूबर की शाम को पुनः उत्तरकाशी में थे l थके होने की वजह से हमने अगले दिन भी उत्तरकाशी में रुकने का फैसला किया l अगले दिन यानी ६ अक्टूबर को हमने अपने कपड़े वैगरह साफ किये जोकी सफ़र में काफी गंदे हो गये थे l एक दिन पूर्व गंगोत्री से आकर तो हम काशी विश्वनाथ मंदिर नहीं गये थे थके होने की वजह से लेकिन इस दिन गये थे l एक चीज का अंतर हमें ये नजर इस दिन की आज मंदिर में दर्शनार्थियों की भीड़ ज्यादा थी जबकि दो दिन पूर्व आरती के समय मुश्किल से १५-२० लोग रहे होंगे और उनमें से अधिकाँश यात्री ही थे l हमने इस दिन केदार घाट और मणिकर्णिका घाट जाने का सोचा था इस नाम का घाट काशी में भी है l हमने लोगों से रास्ता पूछा लेकिन शाम होने कि वजह से हमें ठीक रास्ता नहीं मालूम पड़ा और हम मोक्ष घाट पहुँच गये l इस घाट पर अंतिम संस्कार किया जाता है l
मोक्ष घाट के फोटो -


इस फोटो ने हमें चकित किया l क्योंकि पीछे कोई चमकने वाली चीज भी नहीं थी और अँधेरा भी था l 










मोक्ष घाट होकर हम काशी विश्वनाथ मंदिर चल पड़े आरती में शामिल होने l वहाँ से आकर हम सो गये l अगले दिन यानी ७ अक्टूबर को हम सुबह आठ बजे बस से निकल पड़े ऋषिकेश के लिए l वह बस हरिद्वार की थी ऋषिकेश हरिद्वार से पहले ही पड़ता है उत्तरकाशी से जाते समय l उत्तरकाशी से ऋषिकेश की दुरी १७५ किलोमीटर है l बस ने करीब ६ घंटे बाद करीब सवा २ बजे हमें ऋषिकेश बस अड्डे उतार दिया l वहाँ से हम ठहरने के लिए त्रिवेणी घाट आ गये जहाँ मैं पूर्व में २ बार भी आ चूका हूँ l मैं ऋषिकेश के राम झुला, लक्ष्मण झुला, लक्ष्मण झुला से २८ किलोमीटर दूर नीलकंठ महादेव आदि स्थान पहले घूम चूका था l लेकिन अमिताभ का ये पहली बार उत्तराखंड आगमन था इसलिए वह ऋषिकेश आना चाहता था वरना हम सीधे हरिद्वार भी जा सकते थे l   वहाँ त्रिवेणी घाट पर भागवत कथा का आयोजन हो रहा था l वह दोनों दिन सुनने गया था l मैं सिर्फ एक दिन ८ अक्टूबर को यानि अगले दिन गया था उस दिन एकादशी भी थी l उसने कहा की वह लक्ष्मण झुला, गीता भवन जाने कि बजाय भागवत सुनने के लिए वही रहेगा अतः हम ७-८ अक्टूबर को त्रिवेणी घाट पर ही रहे l वहाँ हम एक तमिलनाडु के आश्रम में ठहरे थे l  यहाँ बता दूं कि हमने उत्तरकाशी से ऋषिकेश आते समय कोई तस्वीर नहीं खिंची क्योंकि हम यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य के अभ्यस्त हो चुके थे l हा शाम को गंगा आरती कि तस्वीर जरुर खिंची -




९ अक्टूबर की सुबह हम हरिद्वार की बस पकड़कर हरिद्वार आ गये और पुनः इस बार भी बजरंग दल के कार्यालय में ठहरे l हम ३ मुख्य जगह गये जो पास में ही थी l सबसे पहले बिल्केश्वर महादेव ये प्राचीन मंदिर है इसके पास में गौरी कुण्ड है l यहाँ के बारे में मान्यता है की माता पार्वती ने शिव को प्राप्त करने लिए तपस्या किया था l इसके बाद माया देवी के मंदिर गये जहाँ के बारे में माना जाता है कि सती ने शारीर त्यागने के पूर्व तपस्या किया था l इसके बाद अंत में गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) जी के आश्रम गये वहाँ राजा भतृहरि की तपस्या स्थली गुफा अभी भी मौजूद है l उनके ही छोटे भाई राजा विक्रमादित्य थे जिन्होंने हर कि पौड़ी का निर्माण हरिद्वार में करवाया था तथा उनके नाम से विक्रम संवत् प्रसिद्द ही है l शाम को हम हर कि पौड़ी गये थे l रात को हमारी ट्रेन थी दून एक्सप्रेस l जिसे अगले दिन रात को सवा नौ बजे रात को गया पहुँचाना था l लेकिन उसने देर से करीब डेढ़ बजे रात को गया पहुँचाया l अभी पितृपक्ष चल रहा था इसलिए स्टेशन पर काफी भीड़ उन लोगों की थी जो अपने पितरों की मुक्ति के लिए पिंडदान करने गया आये थे l गया तो बहुत प्राचीन काल से प्रसिद्द तीर्थ रहा है l मैंने ३ बजे गंगा दामोदर पकड़ी जिसने मुझे सुबह पाँच बजे पटना स्टेशन पहुँचा दिया l इस प्रकार मेरा यमुनोत्री और गंगोत्री का सफ़र पूरा हुआ l