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Wednesday, 14 October 2015

यात्रा यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की - 2

इस प्रकार यमुनोत्री कि यात्रा करने बाद अब हमें गंगोत्री जाना था l जानकीचट्टी से हम सुबह करीब आठ बजे निकले l हमने बारकोट की बस पकड़ी l जिसने करीब साढ़े दस बजे तक हमें बारकोट पहुँचा दिया l हमें वहाँ से तुरंत ही उत्तरकाशी की बस मिल गयी l हम उसपर सवार होकर चल पड़े उत्तरकाशी की तरफ जोकी बारकोट से करीब ८५-९० किलोमीटर है l बस ने करीब २ बजे हमें उतरकाशी पहुँचा दिया l हम जब उत्तरकाशी पहुँचे तो गंगोत्री वाली बस लगी हुई थी l जोकी आधे घंटे बाद २.३० में खुलती l हम उत्तरकाशी आते-आते थकान महसूस करने लगे थे तथा यमुनोत्री में हमें ठंढ ने बहुत परेशान किया था इसलिए हमने उत्तरकाशी में ही रुकने का फैसला किया l वैसे उत्तरकाशी से गंगोत्री कि दुरी १०० किलोमीटर ही है l वहाँ जाकर हम बिरला धर्मशाला में ठहरे  जोकी बस अड्डे के पास ही है l फिर भोजन आदि करके २-३ घंटे आराम करके हम शाम को वहाँ के विश्वनाथ मंदिर गये l  धार्मिक दृष्टि से उत्तरकाशी का महत्व काशी (वाराणसी) के तरह ही है l यहाँ भी विश्वनाथ मंदिर से थोड़ी दूर पर केदार घाट और मणिकर्णिका घाट है l मार्ग की जानकारी के अभाव में उन घाटों पर हम नहीं जा सके l इसके अलावा उत्तरकाशी में नचिकेता ताल भी है l जिसके बारे में ऐसी मान्यता है की आज भी वहाँ नचिकेता आते है l हमने एक स्थानीय व्यक्ति से पूछा तो उसने बतलाया कि पहले इसके लिए १२ किलोमीटर ऑटो से जाना होगा फिर १८ किलोमीटर पैदल इसलिए हमने वहाँ जाने का विचार छोड़ दिया l नचिकेता और यमराज का प्रसिद्द संवाद कठोपनिषद् में वर्णित है l इस प्रकार ४ अक्टूबर की शाम को हम उत्तरकाशी में थे l हम वहाँ काशी विश्वनाथ मंदिर तथा बगल में स्थित हनुमान मंदिर गये l हम काशी विश्वनाथ मंदिर में शाम को ७ बजे होने वाली आरती में शामिल हुए l इसके अलावा मंदिर परिसर में स्थित विशाल और वजनी त्रिशूल के दर्शन किये जिसके बारे में कहा जाता है की इसी से देवी ने महिषासुर का वध किया था l
वहाँ के कुछ फोटो -
इसी त्रिशूल के बारे में ये माना जाता है कि इससे देवी ने महिषासुर का वध किया था l


 त्रिशूल का निचला भाग

रात को वहाँ से होकर भोजन आदि के बाद हम वापस बिरला धर्मशाला में आ गये l अगले दिन हमें गंगोत्री जाना था l वहाँ जाने के बारे में पता किया तो मालुम पड़ा की आजकल तीर्थयात्री कम आ रहे हैं इसलिए कम ही बस वहाँ जा रही है l हमें वहाँ जीप से जाना होगा l अगली सुबह करीब ६ बजे हम गंगोत्री के लिए निकल पड़े l जीप बीच-बीच में रुकते-रुकते जा रही थी l हम भी प्राकृतिक नज़ारे का आनंद लेते हुए करीब पौने ११ बजे गंगोत्री पहुँच गये l यमुनोत्री कि भाँति गंगोत्री में ज्यादा नहीं चलना पड़ता सिर्फ ५०० मीटर कि दुरी पर मंदिर है जहाँ जीप ने हमें उतारा था l प्रस्तुत है उत्तरकाशी से गंगोत्री तक का सफ़र फोटो के माध्यम से -


रास्ते में रुककर चाय पीते हुए

गंगोत्री जाते समय पत्थर गिरने से मार्ग अवरुद्ध हुआ था l लेकिन क्रेन के द्वारा १० मिनट में ही मार्ग को साफ़ कर लिया गया l

ऐसी भयानक और बड़ी चट्टान कई जगह  मौजूद है जो कभी भी गिर सकती है l



यही पर जीप ने हमें उतारा था l

एक विदेशी यात्री






गंगोत्री मंदिर



ये हमारे साथ जीप में उत्तरकाशी से साथ आये थे l ये महाराष्ट्र के थे l इन्होने बतलाया की वे ३५ वर्ष पूर्व चार धाम की यात्रा कर चुके है l इस बार भी चार धाम कि यात्रा पर निकले थे l सबसे पहले ये गंगोत्री आये थे l वापसी में ये हमारे साथ ही गये थे उत्तरकाशी और बिरला धर्मशाला में ही ठहरे थे l ये वहाँ से यमुनोत्री के लिए निकले थे अगले दिन l

यहाँ हमने आलु के पराँठे खाए थे l

चूँकि यमुनोत्री में हमें ठण्ड बर्दास्त से बहर लगी थी अतः हमने गंगोत्री में नहीं रुकने का फैसला किया था l वहाँ करीब डेढ़ दो घंटे रुकने के बाद हम वापस दूसरी जीप से उत्तरकाशी चल दिए थे l वापसी का सफ़र फोटो के माध्यम से -


 अमिताभ और ड्राईवर
 रास्ते में मौजूद सेब के बगान l सेब ४० रुपये किलो मिल रहा था l जीप में मौजूद लगभग सभी ने खरीदी लेकिन मैंने नहीं क्योंकि मुझे सेब ज्यादा पसंद नहीं l





 गंगोत्री से वापस आकर इतना थक गया था की हमें करीब २ घंटे तक उठने की हिम्मत नहीं हुई l

इस प्रकार गंगोत्री धाम के दर्शन कर हम ५ अक्टूबर की शाम को पुनः उत्तरकाशी में थे l थके होने की वजह से हमने अगले दिन भी उत्तरकाशी में रुकने का फैसला किया l अगले दिन यानी ६ अक्टूबर को हमने अपने कपड़े वैगरह साफ किये जोकी सफ़र में काफी गंदे हो गये थे l एक दिन पूर्व गंगोत्री से आकर तो हम काशी विश्वनाथ मंदिर नहीं गये थे थके होने की वजह से लेकिन इस दिन गये थे l एक चीज का अंतर हमें ये नजर इस दिन की आज मंदिर में दर्शनार्थियों की भीड़ ज्यादा थी जबकि दो दिन पूर्व आरती के समय मुश्किल से १५-२० लोग रहे होंगे और उनमें से अधिकाँश यात्री ही थे l हमने इस दिन केदार घाट और मणिकर्णिका घाट जाने का सोचा था इस नाम का घाट काशी में भी है l हमने लोगों से रास्ता पूछा लेकिन शाम होने कि वजह से हमें ठीक रास्ता नहीं मालूम पड़ा और हम मोक्ष घाट पहुँच गये l इस घाट पर अंतिम संस्कार किया जाता है l
मोक्ष घाट के फोटो -


इस फोटो ने हमें चकित किया l क्योंकि पीछे कोई चमकने वाली चीज भी नहीं थी और अँधेरा भी था l 










मोक्ष घाट होकर हम काशी विश्वनाथ मंदिर चल पड़े आरती में शामिल होने l वहाँ से आकर हम सो गये l अगले दिन यानी ७ अक्टूबर को हम सुबह आठ बजे बस से निकल पड़े ऋषिकेश के लिए l वह बस हरिद्वार की थी ऋषिकेश हरिद्वार से पहले ही पड़ता है उत्तरकाशी से जाते समय l उत्तरकाशी से ऋषिकेश की दुरी १७५ किलोमीटर है l बस ने करीब ६ घंटे बाद करीब सवा २ बजे हमें ऋषिकेश बस अड्डे उतार दिया l वहाँ से हम ठहरने के लिए त्रिवेणी घाट आ गये जहाँ मैं पूर्व में २ बार भी आ चूका हूँ l मैं ऋषिकेश के राम झुला, लक्ष्मण झुला, लक्ष्मण झुला से २८ किलोमीटर दूर नीलकंठ महादेव आदि स्थान पहले घूम चूका था l लेकिन अमिताभ का ये पहली बार उत्तराखंड आगमन था इसलिए वह ऋषिकेश आना चाहता था वरना हम सीधे हरिद्वार भी जा सकते थे l   वहाँ त्रिवेणी घाट पर भागवत कथा का आयोजन हो रहा था l वह दोनों दिन सुनने गया था l मैं सिर्फ एक दिन ८ अक्टूबर को यानि अगले दिन गया था उस दिन एकादशी भी थी l उसने कहा की वह लक्ष्मण झुला, गीता भवन जाने कि बजाय भागवत सुनने के लिए वही रहेगा अतः हम ७-८ अक्टूबर को त्रिवेणी घाट पर ही रहे l वहाँ हम एक तमिलनाडु के आश्रम में ठहरे थे l  यहाँ बता दूं कि हमने उत्तरकाशी से ऋषिकेश आते समय कोई तस्वीर नहीं खिंची क्योंकि हम यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य के अभ्यस्त हो चुके थे l हा शाम को गंगा आरती कि तस्वीर जरुर खिंची -




९ अक्टूबर की सुबह हम हरिद्वार की बस पकड़कर हरिद्वार आ गये और पुनः इस बार भी बजरंग दल के कार्यालय में ठहरे l हम ३ मुख्य जगह गये जो पास में ही थी l सबसे पहले बिल्केश्वर महादेव ये प्राचीन मंदिर है इसके पास में गौरी कुण्ड है l यहाँ के बारे में मान्यता है की माता पार्वती ने शिव को प्राप्त करने लिए तपस्या किया था l इसके बाद माया देवी के मंदिर गये जहाँ के बारे में माना जाता है कि सती ने शारीर त्यागने के पूर्व तपस्या किया था l इसके बाद अंत में गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) जी के आश्रम गये वहाँ राजा भतृहरि की तपस्या स्थली गुफा अभी भी मौजूद है l उनके ही छोटे भाई राजा विक्रमादित्य थे जिन्होंने हर कि पौड़ी का निर्माण हरिद्वार में करवाया था तथा उनके नाम से विक्रम संवत् प्रसिद्द ही है l शाम को हम हर कि पौड़ी गये थे l रात को हमारी ट्रेन थी दून एक्सप्रेस l जिसे अगले दिन रात को सवा नौ बजे रात को गया पहुँचाना था l लेकिन उसने देर से करीब डेढ़ बजे रात को गया पहुँचाया l अभी पितृपक्ष चल रहा था इसलिए स्टेशन पर काफी भीड़ उन लोगों की थी जो अपने पितरों की मुक्ति के लिए पिंडदान करने गया आये थे l गया तो बहुत प्राचीन काल से प्रसिद्द तीर्थ रहा है l मैंने ३ बजे गंगा दामोदर पकड़ी जिसने मुझे सुबह पाँच बजे पटना स्टेशन पहुँचा दिया l इस प्रकार मेरा यमुनोत्री और गंगोत्री का सफ़र पूरा हुआ l

Tuesday, 13 October 2015

यात्रा यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की - 1

इसइस मैंने तथा गया के अमिताभ मिश्रा ने इस बार सितम्बर के अंत में यमुनोत्री और गंगोत्री जाने का विचार किया l वहाँ जाने कि इच्छा काफी समय से थी l इससे पूर्व उत्तराखंड में मैं हरिद्वार और ऋषिकेश के आगे कभी नहीं गया था अतः ये बिल्कुल नया सफ़र रहने वाला था l वहाँ जाने के लिए जब हमने पटना से ट्रेन देखा तो उसमें वेटिंग चल रहा था फिर कुछ विचार के बाद इलाहाबाद से देखा तो वहाँ से हरिद्वार तक सीट उपलब्ध था l अतः हमने निश्चय किया कि हम इलाहाबाद तक पटना और गया से आ जाए २७ को तथा २८ के शाम को l हरिद्वार के लिए वहाँ से निकलेंगे l मैं २७ सितम्बर के दोपहर में पटना से ब्रह्मपुत्र मेल पकड़ी और रात को करीब ८ बजे इलाहाबाद पहुँच गया l अमिताभ भी मुझे थोड़ी देर पूर्व इलाहाबाद पहुँचा हुआ था l फिर हम उसके एक परिचित के यहाँ धुमरगंज में जाकर रुके l काफी थके थे फिर भी भोजन गप्प शप आदि में रात के ११ बज ही गये उसके बाद ही हम सोने गये l 
ऐसे तो प्रयाग तीर्थ है l लेकिन जहाँ हम ठहरे थे वहाँ से नदी दूर थी इसलिए हमने वहाँ जाकर नहाने का विचार छोड़ दिया l अगले दिन यानी २८ सितम्बर को हमारी ट्रेन थी l हमने पास से ही कुछ आवश्यक समान ख़रीदा और शाम तक कमरे में ही रहे l फिर शाम को लिंक एक्सप्रेस पकड़कर हरिद्वार के लिए निकल पड़े l 



 इलाहबाद शहर का एक नजारा 






इलाहाबाद में मैं इसी के पास ठहरा था इसका नाम विपुल है l 




अगले दिन ट्रेन से हम दिन के करीब १२ बजे हरिद्वार स्टेशन पर थे l हमें ट्रेन में किसी व्यक्ति ने बतलाया था की चार धाम यात्रा का पंजीकरण करना जरुरी है तथा वह स्टेशन पर ही हो जाएगा l हमें सिर्फ यमुनोत्री और गंगोत्री जाना था अतः हमने उन दोनों जगह का पंजीकरण करवा लिया l वहाँ से हम बजरंग दल के कार्यालय गये और वही ठहरे l अमिताभ बजरंग दल से जुड़ा है l दोपहर हो चुकी थी अतः सामान वहीँ रखकर हम हर की पौड़ी में स्नान करने चले गये जोकी वहाँ से करीब डेढ़ किलोमीटर होगा लेकिन वहाँ जाने में कोई परेशानी नहीं है क्योंकि वह बस अड्डा और स्टेशन से बिल्कुल सीधे पूरब दिशा कि तरफ है l हर की पौड़ी का निर्माण महान हिन्दू राजा विक्रमादित्य ने करवाया था l वहाँ से स्नान कर करीब डेढ़ बजे हम वापस आ गये फिर २-३ घंटे आराम करने के बाद शाम को पुनः वहाँ गये l शाम को हर की पौड़ी पर बहुत भव्य गंगा आरती होती है जो देखने योग्य होती है l


हर की पौड़ी के कुछ दृश्य :-







अमिताभ इसी के साथ मैंने यमुनोत्री और गंगोत्री कि यात्रा की थी



 गंगा आरती का दृश्य फोटो थोडा दूर से लिया गया है इसलिए साफ़ नजर नहीं आ रहा

अमिताभ 



इस प्रकार गंगा आरती देखकर तथा भोजन आदि करकर रात के करीब आठ बजे हम पुनः बजरंग दल के कार्यालय आ गये तथा तैयार हो गये अगले दिन के सफ़र के लिए जो यमुनोत्री की होनेवाली थी l शाम हो हमने जाकर पता किया था तो मालुम हुआ था की एक लोकल टाइप बस यमुनोत्री जाती है सुबह साढ़े तीन बजे l उतना सबरे उठकर तैयार होकर बस पकड़ पाना हमारे लिए संभव नहीं था इसलिए उस बस से जाने का विचार हमने छोड़ दिया l किसी ने हमें गलत जानकारी भी दी की यमुनोत्री कि बस सुबह साढ़े ५ बजे मिलेगी l खैर अगली सुबह यानी ३० सितम्बर को हम सुबह ५ बजे बस अड्डे पहुँच गये वहाँ जाकर मालूम हुआ की यमुनोत्री की कोई बस हरिद्वार से नहीं मिलेगी l हाँ गंगोत्री की बस जरुर मिल जायेगी l हमें तो पहले यमुनोत्री जाना था अतः उस बस से जाने का सवाल ही नहीं था l हालाँकि उस बस के ड्राईवर ने हमें धराशु बैंड तक उस बस से चलने को कहा था लेकिन हम तैयार नहीं हुए क्योंकि धरासू बैंड जरुर यमुनोत्री और गंगोत्री का कॉमन पॉइंट है लेकिन अगर वहाँ से यमुनोत्री कि बस नहीं मिलती तो हमारे लिए समस्या हो जाती l मैंने नेट आदि से जो जानकारी जुटा रखी थी उसके अनुसार ऋषिकेश से एक ही बस सुबह में यमुनोत्री के लिए जाती थी साढ़े पाँच बजे l हाँ देहरादून से १२ बजे तक बारकोट की बस मिल जाती है जोकी यमुनोत्री से करीब ४५ किलोमीटर दूर है l अतः हमने देहरादून की बस पकड़ी और वहाँ के पर्वतीय बस अड्डे पहुँचे l वहाँ जाकर मालुम पड़ा अगली बस ९ बजे है उस तरफ की लेकिन वह नौगाँव तक ही जायेगी बारकोट तक नहीं l पूछताछ में मालुम पड़ा कि वहाँ से बारकोट मात्र १० किलोमीटर है और नौगाँव से बारकोट के लिए सवारी आसानी से मिल जायेगी l अतः हमने देहरादून से नौगाँव का टिकट कटवाया और चल पड़े जिसने करीब साढ़े चार घंटे में हमें नौगाँव पहुँचा दिया l 

हमें देहरादून से नौगाँव ले जानेवाला ड्राईवर 

फिर नौगाँव में कुछ ही देर बाद एक जीप में बैठकर हम बारकोट आ गए l और हमारा समय अच्छा था इसलिए हमें तुरंत एक बस मिल गयी जानकीचट्टी की l यहाँ बता दूं की गाडिया जानकीचट्टी तक ही जाती है और वहाँ से यमुनोत्री मंदिर तक ५ किलोमीटर की चढ़ाई है जोकी पैदल तय करनी होती है l जो चलने में असमर्थ है वे डोली या खच्चर पर बैठकर जाते है l वह लोकल टाइप बस थी जो बीच-बीच में रोकते हुए सवारियों को चढ़ाते उतारते जा रही थी l  उसने अँधेरा घिरने तक हमें जानकीचट्टी पहुँचा दिया l वहाँ एक लॉज वाले ने हमसे कमरे के बारे में पूछा l हमने रेट पूछा तो उसने सौ रुपये रोज का बतलाया l रेट सही था अतः हम तुरंत तैयार हो गये l इतना सस्ता कमरा मिलने कि वजह ये थी कि अभी ऑफ सीजन चल रहा था l सबसे अधिक तीर्थयात्री अप्रैल मई के समय आते है l   यात्री कम आते थे इसलिए लॉज में भी कुछ ही कमरे लगे हुए थे l इसलिए भोजन भी समय से बनता था एक बार दिन में करीब १२ बजे और रात में करीब ८ बजे l भोजन में रोटी, चावल, दाल और सब्जी थी l रेट था ६० रुपये थाल l हमने कुछ अन्य चीज जैसे आलु पराँठा आदि बनाने के बारे में पूछा तो लॉजवाले ने अपनी असमर्थता प्रकट थी l खैर वहाँ काफी ठंढ थी इतनी ठंढ में जो मिल रहा था वही हमारे लिए काफी थी इसलिए हमने जोर नहीं दिया l वहाँ सालों भर ठंढ पड़ती है इसलिए पंखे का पॉइंट भी नहीं लगा था l 

बारकोट से जानकीचट्टी के कुछ नज़ारे









लॉज के कमरे में आराम करते हुए




अगली सुबह यानी 1 अक्टूबर को करीब ६ बजे हम जानकीचट्टी से ऊपर यमुनोत्री की मंदिर की ओर चल पड़े l जोकी ५ किलोमीटर का सफ़र था l देखे सफ़र फोटो के माध्यम से - 









ये हमें रास्ते में मिले थे l ये अयोध्या के रहने वाले थे और चार धाम के सफ़र में निकले थे ग्रुप में l इनके ग्रुप के लोग पीछे रह गये थे अतः ये ऊपर तक हमारे साथ ही गये थे l











रास्ते में पड़ने वाली भैरव घाटी और मंदिर





 यमुनोत्री मंदिर के पास ही गर्म कुण्ड है जिसमे पूजा करने के पूर्व लोग स्नान करते है जिससे सारी थकावट दूर हो जाती है l

 यमुनोत्री मंदिर




 मंदिर के पास से ही यमुना नदी बहती है जिसका जल बिल्कुल साफ़ है हा ठंढा जरुर है l





इस प्रकार यमुनोत्री मंदिर के दर्शन कर हम शाम तक वापस जानकीचट्टी आ गये l लेकिन मेरी इच्छा सप्तऋषि कुण्ड और और उसके भी आगे बन्दरपूंछ ग्लेशियर जाने कि थी जो यमुना का उद्गम स्थल माना जाता है l जैसा कि स्थानीय लोगों ने बतलाया था उसकी दुरी यमुनोत्री से से ही १२ से १४ किलोमीटर रही होगी l मेरी वहाँ जाने कि इच्छा तो थी लेकिन समस्या ये थी कि साथ में कोई जाने वाला नहीं था l यहाँ कम लोग ही जाते है हा गोमुख जरुर ज्यादा लोग जाते है जोकी गंगोत्री से १८ किलोमीटर है l    तो कोई गाइड भी नहीं मिल रहा था l जब शाम को वापस जानकीचट्टी आया तो लॉज में रहने वाले एक लड़के ने एक गाइड बुला दिया l मैं पुरी तैयारी के साथ नहीं गया था वहाँ के लिए टेंट और स्लीपिंग बैग जरुरी है l अतः हमें उसी दिन वापस आ जाना था l शाम हो चुकी थी फिर भी हम उसी दिन यमुनोत्री दुबारा चले गये क्योंकि उससे अगले दिन हमें ५ किलोमीटर का सफ़र कम तय करना पड़ता l खैर जो आवश्यक समान लेना था हमने ले लिया l कपूर साँस फूलने पर l बिस्कुट के पैकेट l हम रात को ऊपर ही ठहरे l यमुनोत्री में जानकीचट्टी से अधिक ठंढ थी l मैंने २ स्वेटर पहन रखा था इसके अलावा एक रजाई और २ कम्बल ओढ़ रखा था l शाम के बाद ठंढ बहुत बढ़ जाती है l रात को जिस आश्रम में हम ठहरे थे यमुनोत्री में वहाँ के होटल में भोजन करने एक विदेशी भी आया था एक शिख के साथ l वे लोग सप्तऋषिकुण्ड के दर्शन करके वापस आ रहे थे l उसने पुलिस को बताया था कि वहाँ एक व्यक्ति कि लाश है l  जब पुलिस को उसके माध्यम से मालुम हुआ कि हम लोग वहाँ जा रहे हैं तो उसने हमें वहाँ जाने से मना किया l जब हमने अपने रिस्क पर जाने कि बात कही तब उसने बारकोट में अपने सीनियर अफसर से पूछकर हमें मना किया l उसने हमें हिदायत भी दिया कि चले मत जाइएगा l 
लेकिन हम कहाँ मानने वाले थे l अगली सुबह यानी २ अक्टूबर को हम चुपचाप वहाँ के लिए निकल पड़े निर्भय होकर l रास्ता बीच-बीच में दुर्गम था l कई बार मैं फिसला l कई बार रास्ता में मुझे गाइड ने डंडे के सहारे से पार करवाया l बीच-बीच में मैं रुक-रुक कर चल रहा था l साँस फूलने पर कपूर सूंघ लेता था l होते-होते 1 बज गये और हम सप्तऋषि कुण्ड से करीब २ किलोमीटर रह गये थे l मैं काफी थक गया था l आगे जा सकता था लेकिन उसमे करीब २ घंटे से ज्यादा लगते इसलिए हमने लौटे का फैसला किया क्योंकि जंगल में हम दोनों अकेले थे दूर-दूर तक कोई नहीं था l रात हो जाने पर समस्या हो जाती l ठंढ भी बढ़ने लगा था क्योंकि हम बन्दरपूंछ पहाड़ के करीब आ गये थे l हम वापस चल पड़े और सात बजे तक यमुनोत्री पहुँच गये l शाम को करीब ६ बजे अँधेरा हो गया था l हमारे पास टॉर्च थी फिर भी रास्ते को देख-देख कर चलने पड़ता था l जहाँ ठहरा था वहाँ जाकर तुरंत चाय पी ठण्ड के मारे हमारा बुरा हाल था l मैं चाय पीकर रजाई ओढ़कर सो गया l एक घंटे बाद मुझे भोजन के लिए बुलाया गया l भोजन करने जब कमरे से उतर कर गया तो मुझे काफी ठंढ लग रही थी खैर भोजन करके मैं सो गया और अगले दिन करीब ७ बजे उठा l और उठाकर फिर नीचे जानकीचट्टी आ गया l काफी थका था इसलिए उस दिन यानी ३ अक्टूबर को जानकीचट्टी में ही रुकने का फैसला किया l           

सप्तऋषि कुण्ड कि अपूर्ण यात्रा के कुछ दृश्य l ये यात्रा बेहद थकाने वाली थी तथा अपूर्ण रही थी इसलिए फोटो खींचने का विशेष उत्साह नहीं था -




 गाइड और उसका कुत्ता l ये कुत्ता हमारे साथ पुरे सफ़र में रहा l




३ अक्टूबर के शाम को हमने जानकीचट्टी के पास स्थित खरसाली गाँव देखने गये l वहाँ के कुछ दृश्य -

यमुनोत्री के एक स्थानीय पुजारी l ये हमें लॉज में मिले थे l
 जानकीचट्टी बस अड्डा


 शनि मंदिर




 नया बन रहा मंदिर


 शिव मंदिर यहाँ ताला लटका था l
 ये घर लकड़ी का बना था और ऊपर से कागज़ चिपकाया गया हुआ था l
 जब यमुनोत्री के पट दीपावली के बाद बंद हो जाते है तो उस समय यही पर पूजा होती है l

शाम को घूमकर हम वापस आ गये l लॉज में रहने वाले एक लड़के पवन ने हमें ५ तारीख तक रुकने को कहा था क्योंकि उस दिन मेला लगने वाला था l हम तैयार हो गये थे उस समय तक रहने को लेकिन अगले दिन यानी ४ अक्टूबर कि सुबह हमने गंगोत्री कि तरफ प्रस्थान करने का फैसला किया l यहाँ रहते-रहते कुछ बोरियत महसूस होने लगी थी हालाँकि हमारे चल देने कि मुख्य वजह ठंढ थी l लॉज वाले ने कहा है कि अगली बार मैं आऊंगा तो मुझे सप्तऋषि कुण्ड ले चलेगा l देखना है दुबारा कब वहाँ जाता हूँ l